यह मंदिर राजा का तालाब से लगभग 4 किलोमीटर दूर, ग्राम पंचायत गुरियाल के कोटे वाले जंगल में स्थित है। मुख्य मार्ग (राजा का तालाब) पर माता के स्वागत में एक विशालकाय द्वार (गेट) निर्मित है, जहाँ वर्षभर देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं।
📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और कथा
इस धाम का इतिहास 12वीं शताब्दी की एक ऐतिहासिक घटना से जुड़ा हुआ है:
दिल्ली की गद्दी का हस्तांतरण: 12वीं सदी में दिल्ली के शासक आनंद पाल तोमर ने अपना सिंहासन अपने दोहते पृथ्वीराज चौहान को सौंप दिया।
विद्रोह और पलायन: इस निर्णय के विरोध में तोमर वंश के संबंधियों ने विद्रोह कर दिया। जब पृथ्वीराज चौहान ने इस विद्रोह को कड़ाई से कुचला, तो विद्रोही अपनी जान बचाकर उत्तर की ओर (शिवालिक की पहाड़ियों में) भागे।
कुलदेवी की स्थापना: कोटा क्षेत्र से भागते समय ये लोग अपनी कुलदेवी की प्रतिमा साथ ले आए और उन्हें यहाँ के जंगलों में सुरक्षित स्थापित कर दिया। इसी कारण इस स्थान और माता को 'कोटे वाली माता' के नाम से जाना जाने लगा।
🌸 चमत्कारिक लोककथा: "माँ और बेटी का प्रेम"
स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार: संतान प्राप्ति की मन्नत: गुरियाल गाँव के एक निःसंतान दंपति ने माता के दरबार में मन्नत मांगी, जिसके फलस्वरूप उनके घर एक कन्या ने जन्म लिया।
भूल और क्षमा: समय बीतने के साथ परिवार माता के दरबार में मत्था टेकना भूल गया। एक दिन वह कन्या अचानक गायब हो गई। काफी खोजबीन के बाद जब कोई सुराग न मिला, तो रोते-बिलखते माता-पिता को अपनी गलती का एहसास हुआ और वे दौड़कर माता के दरबार में क्षमा मांगने पहुँचे।
माता की कृपा: मां की असीम कृपा से वह बालिका मंदिर के पीछे से सकुशल बाहर निकल आई। जब माता-पिता ने पूछा कि वह कहाँ थी, तो उसने सरलता से उत्तर दिया— "मैं अपनी अम्मा से मिलने आई थी, उन्होंने मुझे हलवा-पूरी खिलाया।"
इस चमत्कार के बाद माता की महिमा दूर-दूर तक फैल गई।
🏛️ मंदिर व्यवस्था एवं वर्तमान स्थिति
प्रबंधन: वर्ष 1971 से मंदिर के रख-रखाव और संचालन की जिम्मेदारी गुरियाल गाँव की मंदिर कमेटी संभाल रही है।
परंपरा में बदलाव: पहले यहाँ मन्नत पूरी होने पर बकरों की बलि दी जाती थी, परंतु बलि प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगने के बाद अब यहाँ केवल मीठा प्रसाद ही चढ़ाया जाता है।
मुख्य समस्या व श्रद्धालुओं की मांग:
राजा का तालाब से मंदिर जाने वाले मार्ग पर रेलवे फाटक पड़ता है, जहाँ रेलवे विभाग ने लोहे के एंगल लगाकर मार्ग बंद कर दिया है।
इस कारण श्रद्धालुओं के चार पहिया वाहन (कार/बस आदि) सीधे मंदिर तक नहीं पहुँच पाते।
श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों की पुरजोर मांग है कि यहाँ रेलवे ओवरब्रिज बनाया जाए ताकि दर्शनार्थियों को आवागमन में सुविधा हो सके।
